हिंदी के डी.आर.सी साक्षात्कार के दस्तावेज सत्यापन हेतु सहायक प्राध्यापकों की सूची जारी की गई है, जिसमें विश्वविद्यालय प्रबंधन के द्वारा मनमानी ढंग से नियमों को अनदेखा करते पैनल गठन किया गया है।जिसमें मूल रूप से कुछ आपत्तिजनक बिंद्रसामने देखने कोमिल रहे है। सुची में वरिष्टता काध्यान नहीं रखा गया है। जब भी कोई कमेटी का गठन होता है तोरोस्टर पद्धति से कमेटी बनती है। इन नियमों का पालन नहीं किए जाने सेकई सवाल खड़े हो रहे हैं।
सुची में एक को छोड़कर सब बाहरी राज्य के
कई एवं मनमानी के आरोप लगने के बाद भी अब 10 साक्षात्कार दस्तावेज सत्यापन हेतु सहायक के प्राध्यापकों की सूची को लेकर भी प्रश्न चिन्ह लगना शुरू हो गया है।पैनल में छतीसगढ़ के मूल निवासी प्राध्यापकों को नहीं लिया गया है,मात्र एक को छोड़कर सभी प्राध्यापक अन्य राज्य से संबंधित है। पूर्व में हुए विभिन्न विषयों के साक्षात्कार में भी पी-एच.डी छात्रों द्वारा चयनित किये गये प्राध्यापक गाईड को दरकिनार करते हुए मनमानी ढंग से उन्हें चयन कियागया है।
इस तरह की चयन प्रक्रिया प्राध्यापकों और छात्रों में कितना हितकारी है यह तो सूची जारी करने वाले ही बता पाएंगे, परंतु इस सूचीको लेकर आगे विवाद बढ़ सकताहै। चूंकि सरगुजा अंचल आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और यहाँ सरगुजिहा, सादरी, लरिया, कुडूख भाषी छात्र होंगे, बाहरी प्राध्यापकों के पैनल में होने वे स्थानीय विषय एवं मुद्दा को समझ नहीं पायेंगे जिससे छात्रों के अन्याय होने की पूर्ण संभावना है, अब देखते हैं विश्वविद्यालय प्रशासन अब क्या कार्यवाही करती है। जिसका विरोध सभी तरफ होना शुरू हो गया है। चूंकि पैनल में जूनियर प्राध्यापकों को लिया गया है।