रायपुर। भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, संस्कार और जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर है। इस दिन विद्यार्थी अपने गुरु का आशीर्वाद लेते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर के समान स्थान दिया गया है। गुरु केवल शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व, संस्कार और जीवन मूल्यों का निर्माण भी करते हैं। कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा—
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।”
गुरु के महत्व को स्पष्ट करता है। यह पर्व हमें अपने शिक्षकों, माता-पिता और उन सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है, जिन्होंने जीवन में सही दिशा दिखाई।
कैसे मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा?
गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने गुरु का पूजन करते हैं, उनका आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें वस्त्र, फल, पुस्तक या अन्य उपहार भेंट करते हैं। विद्यालयों, आश्रमों और धार्मिक संस्थानों में विशेष कार्यक्रम, प्रवचन, भजन-कीर्तन और सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं। कई लोग इस दिन दान-पुण्य, ध्यान और आध्यात्मिक साधना भी करते हैं।
आधुनिक समय में गुरु का महत्व
आज के डिजिटल युग में ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन उपलब्ध हैं, लेकिन सही दिशा दिखाने वाले गुरु का महत्व आज भी उतना ही है। शिक्षक, माता-पिता, प्रशिक्षक और जीवन में प्रेरणा देने वाले सभी व्यक्ति हमारे गुरु हैं। उनके मार्गदर्शन से ही व्यक्ति सफलता की ओर अग्रसर होता है।
समाज के लिए संदेश
गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा को सशक्त बनाने और ज्ञान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और निरंतर सीखने की भावना से मिलती है। गुरु का सम्मान और उनके बताए आदर्शों का पालन ही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।



