बस्तर दशहरा के लिए दंतेवाड़ा से रवाना हुईं मां दंतेश्वरी, डोली और राजछत्र को दी गई भावुक विदाई

दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की तैयारियों के बीच मां दंतेश्वरी की पावन डोली और राजछत्र को रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। शारदीय नवरात्र की अष्टमी पर आयोजित इस पारंपरिक विदाई समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और माता के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।

जयकारों के बीच मां की डोली को विदाई

मां दंतेश्वरी की डोली को विदा करने के लिए मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की। पारंपरिक लोकनृत्य और वाद्य यंत्रों की धुन के बीच डोली की रवानगी ने माहौल को भावुक बना दिया। इस दौरान मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बल ने सलामी देकर मां को सम्मान दिया।

डोली और राजछत्र की यह यात्रा बस्तर की धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या है मावली परघाव की परंपरा?

बस्तर दशहरा में मावली परघाव का विशेष महत्व है। इस रस्म के तहत दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली जगदलपुर पहुंचती है, जहां मावली माता के पारंपरिक स्वागत और मिलन से जुड़ी धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं। यह परंपरा बस्तर की जनजातीय संस्कृति, धार्मिक विश्वास और ऐतिहासिक राजपरंपरा से गहराई से जुड़ी हुई है।

बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान रखता है। यहां उत्सव का मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और सामुदायिक सहभागिता है।

27 अक्टूबर को दंतेवाड़ा लौटेगी डोली

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र बस्तर दशहरा के धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के बाद 27 अक्टूबर को दंतेवाड़ा के लिए वापस रवाना होंगे। यात्रा के दौरान निर्धारित पूजा स्थलों पर परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे।

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