रायपुर | 26 अगस्त 2026 | छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहर को संजोने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अब प्रदेश की लोक कला, रीति-रिवाजों और पारंपरिक धरोहरों को स्कूली पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है। शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6वीं से लेकर 12वीं तक के विद्यार्थी अपनी माटी की संस्कृति, पारंपरिक त्योहारों, लोक नृत्यों और ऐतिहासिक महापुरुषों के बारे में विस्तार से पढ़ाई करेंगे।
कक्षा 6वीं से 12वीं तक के सिलेबस में बड़ा बदलाव
स्कूल शिक्षा विभाग और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने पाठ्यक्रम के पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी कर ली है। नए पाठ्यक्रम में प्रदेश के प्रमुख लोक नृत्यों (पंथी, सुआ, करमा, राउत नाचा), पारंपरिक लोकपर्वों (हरेली, पोला, तीजा), जनजातीय संस्कृति, बस्तर के ऐतिहासिक दशहरे और स्थानीय बोलियों के साहित्य को शामिल किया गया है। इसके अलावा वीर नारायण सिंह, गुंडाधूर और तीजन बाई जैसी महान विभूतियों के योगदान को भी किताबों में स्थान दिया गया है।
किताबी ज्ञान के साथ कला का व्यावहारिक अनुभव
विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देने तक सीमित न रखकर स्थानीय लोक कलाओं और हस्तशिल्प से व्यावहारिक रूप से जोड़ने की योजना है। इसके लिए स्कूलों में समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यशालाएं, लोक कलाकारों से सीधा संवाद और प्रदर्शन सत्र आयोजित किए जाएंगे। शिक्षा विभाग का उद्देश्य नई पीढ़ी में अपनी जड़ों के प्रति जुड़ाव पैदा करने के साथ-साथ पारंपरिक कला रूपों का संरक्षण करना भी है।
शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण सत्र
इस पाठ्यक्रम को सुचारू रूप से लागू करने के लिए शिक्षकों के उन्मुखीकरण (Orientation) और विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। शिक्षकों को स्थानीय कला विधाओं और सांस्कृतिक संदर्भों की गहरी समझ दी जाएगी ताकि वे कक्षाओं में रोचक और प्रभावी तरीके से अध्यापन कर सकें।

