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फैमिली कोर्ट के रवैए पर हाईकोर्ट नाराज: कहा- सिर्फ केस निपटाना जिम्मेदारी नहीं, महिलाओं को न्याय दिलाना अहम है

बिलासपुर, 7 जनवरी 2026: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों में फैमिली कोर्ट की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय जायसवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी केवल मुकदमों का निपटारा करना नहीं है, बल्कि महिलाओं और बच्चों को वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है। 10 11

कोर्ट ने एक महिला की अपील पर सुनवाई करते हुए जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश जारी किया। बेंच ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना कोर्ट की प्राथमिक जिम्मेदारी है। सिर्फ जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जाने की सलाह देकर अपनी जवाबदेही से बचना उचित नहीं। 10 11

क्या है पूरा मामला?
जांजगीर-चांपा जिले में दंपती के बीच तलाक का केस लंबे समय से लंबित था। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में मौखिक रूप से बताया कि आर्थिक तंगी के कारण वह वकील नहीं कर सकती और ओडिशा से बार-बार पेशी पर नहीं आ सकती। इसके बावजूद कोर्ट ने उसे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जाने की सलाह देकर जिम्मेदारी निभा ली। महिला वहां नहीं पहुंची तो कोर्ट ने उसे एक्स-पार्टी घोषित कर पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी। महिला ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। 10 11

हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी सहायता के लिए लिखित आवेदन अनिवार्य नहीं है। मौखिक आग्रह पर भी कोर्ट को मदद करनी चाहिए। वकील न उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। 10 11

सभी फैमिली कोर्ट के लिए नई गाइडलाइन
हाईकोर्ट ने ‘छत्तीसगढ़ फैमिली कोर्ट रूल्स 2007’ के नियम 14 का हवाला देते हुए प्रदेश की सभी फैमिली कोर्ट को वकीलों का अपना पैनल बनाने का निर्देश दिया। अब कोर्ट पक्षकारों को विधिक सेवा प्राधिकरण के भरोसे नहीं छोड़ेंगे, बल्कि पैनल से तत्काल वकील नियुक्त कर सहायता देंगे। वकीलों की फीस राज्य सरकार के राजस्व से दी जाएगी। 10 11

यह फैसला महिलाओं के लिए न्याय तक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अपडेट के लिए बने रहें।

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