ओडिशा से तेंदूपत्ता तस्करी का बड़ा खेल, छत्तीसगढ़ सरकार को हो रहा लाखों का नुकसान

गरियाबंद। ओडिशा सीमा से सटे गरियाबंद जिले में इन दिनों तेंदूपत्ता की तस्करी का बड़ा रैकेट सक्रिय है। ‘हरे सोने’ के नाम से मशहूर इस कीमती वन उत्पाद की अवैध आवाजाही सीमावर्ती क्षेत्रों में खुलेआम की जा रही है। तस्कर कच्ची सड़कों के सहारे दोपहिया वाहनों में तेंदूपत्ता ओडिशा से लाकर अपने जान-पहचान वालों के जरिए स्थानीय खरीदी केंद्रों में खपा रहे हैं। यह सिलसिला वर्षों से बेरोकटोक चल रहा है।

राजनीतिक दबाव में रुकी कार्रवाई
झाखरपारा समिति के सीमावर्ती केंद्रों में जब मीडिया ने ओडिशा से तेंदूपत्ता पहुंचने की जानकारी वन अधिकारियों को दी, तो वे मौके पर पहुंचे और दस्तावेजी कार्रवाई भी की। लेकिन, राजनीतिक दबाव के चलते तस्करों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। रेंजर ने भविष्य में सख्त कदम उठाने का दावा जरूर किया है, मगर अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।

सरकार को लग रहा लाखों का चूना
इस गोरखधंधे से राज्य सरकार को भारी वित्तीय नुकसान हो रहा है। ओडिशा से लाई गई तेंदूपत्ता की गुणवत्ता कम होती है, लेकिन सरकारी भुगतान 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा के हिसाब से किया जाता है। वहीं, ठेका लेने वाली कंपनियां इन खराब पत्तों के लिए बोली भी ठीक से नहीं लगातीं और 5,000 रुपये से भी कम देने को तैयार होती हैं। इससे राजस्व को बड़ा झटका लगता है।

देवभोग रेंज के 7 समितियां खास निशाने पर
जिले की कुल 62 लघु वनोपज समितियों में से ओडिशा सीमा से सटी देवभोग रेंज की 7 समितियों में ठेका कंपनियां पत्तों की कीमत जानबूझकर कम आंक रही हैं। यहां तस्करी का खेल ज्यादा चल रहा है, जिससे सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ शासन को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

निगरानी और सख्त कार्रवाई की जरूरत
इस पूरे मामले ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है सख्त निगरानी और ठोस कार्रवाई की, ताकि वन संपदा की इस तस्करी को रोका जा सके और सरकारी राजस्व की बर्बादी थमे।

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