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नान घोटाले की जांच में हस्तक्षेप का आरोप, अनिल टुटेजा-आलोक शुक्ला और पूर्व AG सतीश वर्मा पर CBI का शिकंजा

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नान घोटाले में अब एक और बड़ा मोड़ आ गया है। CBI ने पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा, डॉ. आलोक शुक्ला और तत्कालीन महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। सीबीआई ने पुष्टि की है कि नान घोटाले की जांच को प्रभावित करने के आरोप में इन सभी के ठिकानों पर छापेमारी की गई है, जिसमें कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज भी बरामद हुए हैं।

क्या हैं आरोप?

CBI के अनुसार, अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला ने अपने पदों का दुरुपयोग कर आर्थिक अपराध शाखा (EOW)/एसीबी रायपुर और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की। आरोप है कि इन अधिकारियों ने मामले में राहत पाने के लिए तत्कालीन महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा को भी अपने पक्ष में काम करने को प्रेरित किया।

इन पर यह भी आरोप है कि जांच में मददगार दस्तावेजों और उच्च न्यायालय में दाखिल होने वाले जवाबों में फेरबदल कराए गए ताकि अग्रिम जमानत हासिल की जा सके। WhatsApp चैट के माध्यम से इस साजिश का खुलासा हुआ है, जिसमें यह दिखाया गया है कि किस तरह से योजनाबद्ध तरीके से जांच को गुमराह किया गया।

क्या है नान घोटाला?

छत्तीसगढ़ में नागरिक आपूर्ति निगम (नान) सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन करता है। फरवरी 2015 में ACB ने नान के मुख्यालय सहित प्रदेश भर में 28 स्थानों पर छापा मारा था। इन छापों में करोड़ों रुपये नकद, संदिग्ध दस्तावेज, डायरी, हार्ड डिस्क आदि जब्त किए गए थे।

आरोप था कि नान अधिकारियों ने घटिया क्वालिटी का चावल राइस मिलों से खरीदा और इसके बदले रिश्वत ली गई। भंडारण और परिवहन में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। इस मामले में कुल 27 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, जिनमें बाद में तत्कालीन अध्यक्ष और एमडी के साथ-साथ दो वरिष्ठ IAS अधिकारी अनिल टुटेजा और डॉ. आलोक शुक्ला के नाम भी सामने आए।

नौकरशाही पर था गहरा नियंत्रण

EOW की FIR में बताया गया है कि अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला सरकार के सबसे ताकतवर अफसरों में गिने जाते थे। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर निर्णय प्रक्रिया तक में इनकी सीधी भूमिका थी। उनके प्रभाव के चलते जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर न्याय प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास किया गया।

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