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सोन नदी का ‘अधूरा’ सच: 2 करोड़ खर्च कर ढाल दिए 2 स्लैब; अब 8 साल से बाकी 3 स्लैब का इंतजार!

बलरामपुर/सूरजपुर: विकास के दावों के बीच छत्तीसगढ़ में एक ऐसा पुल भी है जो सरकारी कछुआ चाल की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। सोन नदी पर निर्माणाधीन इस पुल की कहानी किसी ‘नॉकआउट’ मजाक से कम नहीं है। पिछले 8 सालों से यह पुल आधा-अधूरा खड़ा अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है।

करोड़ों खर्च, पर नतीजा सिफर

जानकारी के मुताबिक, इस महत्वपूर्ण पुल के निर्माण के लिए अब तक लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इस भारी-भरकम राशि से केवल दो स्लैब ही ढाले जा सके हैं। लेकिन पुल को पूरा करने के लिए अभी भी 3 और स्लैब की जरूरत है, जिसके लिए बीते 8 साल से फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर काट रही हैं।

जनता की मुश्किलें: हर साल जान जोखिम में

सोन नदी पर पुल न होने की वजह से आसपास के दर्जनों गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कटा रहता है।

बरसात में ‘नॉकआउट’ संपर्क: बारिश के दिनों में जब नदी उफान पर होती है, तो ग्रामीण नाव के सहारे या जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर होते हैं।

इलाज और शिक्षा का संकट: पुल के अभाव में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती और स्कूली बच्चों को कई किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है।

लेथार्जिक सिस्टम: बजट या नीयत की कमी?

विभाग का तर्क अक्सर ‘बजट की कमी’ या ‘तकनीकी खामी’ होता है, लेकिन सवाल यह है कि जब 2 करोड़ खर्च कर आधा काम हो सकता था, तो बाकी का काम 8 साल तक क्यों लटका रहा?

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