The Story Of Mahishasura: आखिर कौन था महिषासुर, जानिए

Chaitra Navratri 2024: शक्ति न तो पैदा हो सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है, इसे एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में बदला जरूर जा सकता है. विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही इस बात पर सहमत हैं. शक्ति जीवन का सृजन करती है, अपनी ऊर्जा से उसका संचालन करती है, संतुलन बनाकर रखती है और जब इस प्रक्रिया में असंतुलन होने लगता है तो शक्ति ही जीवन से अपनी ऊर्जा को खींच लेती है. इसे ही विनाश, प्रलय या फिर से होने वाली नई शुरुआत कह सकते हैं. शक्ति के परिवर्तन का यह चक्र हमेशा ही चलता रहता है.

देवी दुर्गा की उत्पत्ति:

भारतीय अध्यात्म ने शक्ति को निराकार रूप में पहचाना है और ज्योति स्वरूप में इसकी आराधना की है. इस ज्योति को ही जब साकार शब्दों में पूजा गया तो उसे देवी, भवानी, मां, अंबा और दुर्गा कहकर पुकारा गया है. देवी के स्वरूप और शक्ति की अधिष्ठाता की इसी गाथा को पौराणिक कथाओं में दुर्गा सप्तशती के नाम से पिरोया गया है.

महिषासुर का जन्म:

महाराज दक्ष की एक पुत्री दनु का विवाह भी ऋषि कश्यप से हुआ था. इन्हीं कश्यप और दनु के दो पुत्र थे रंभ और करंभ. बचपन से ही ये दोनों बहुत शक्तिशाली थी और धीरे-धीरे इन्होंने अपना साम्राज्य बहुत बढ़ा लिया था, लेकिन दोनों की एक ही चिंता थी कि उनकी कोई संतान नहीं थी. इसलिए रंभ ने अग्नि के बीच बैठकर और करंभ ने जल में रहकर तपस्या शुरू की. एक दिन करंभ को जल में एक मगर ने खा लिया, भाई की मौत से दुखी रंभ ने उसी अग्नि में जलकर जान देने की कोशिश की, जिसमें वह तपस्या कर रहा था. जैसे ही उसने आग में कूदने का प्रयास किया कि अग्निदेव प्रकट हो गए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा. रंभ ने अग्निदेव से त्रिलोक विजयी पुत्र का वरदान मांगा. रंभ ने कहा, लेकिन मेरा विवाह नहीं हुआ है तो इतने शक्तिशाली पुत्र की माता कौन होगी? तब अग्निदेव ने कहा कि, वरदान लेकर अभी जब तुम घर लौटो तो मार्ग में जिस पर तुम्हें आसक्ति आ जाए, वही तुम्हारे पुत्र की माता बनेगी. ऐसा वरदान पाकर रंभ अपने घर को लौट पड़ा. उधर एक यक्षिणी, भैंस के रूप में धरती पर घूम रही थी. दरअसल वह एक यक्ष से बचने और छिपने के लिए धरती पर आकर भैंस बन गई थी. रंभ ने उस भैंस को देखा तो उस पर मोहित हो गया और उसके साथ संसर्ग किया. उधर, जब यक्ष को इसका पता चला तो उसने यक्षिणी को पाने के लिए रंभ पर हमला कर दिया. दोनों के बीच हुए युद्ध में रंभ मारा गया और यक्षिणी सती होने लगी. तब अग्निदेव ने उसके भ्रूण को बचा लिया और चिता की अग्नि से ही अट्हास करता हुआ आधा भैंसा और आधा नर वाला मायावी दानव प्रकट हुआ. यही दानव महिषासुर कहलाया

महिषासुर मर्दिनी कथा:

दुर्गा सप्तशती का दूसरा अध्याय महिषासुर मर्दिनी की कथा कहता है. महिषासुर नामक दानव त्रिलोक विजयी था और उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया था. हताश देवताओं ने भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा से प्रार्थना की. त्रिदेवों की शक्ति से देवी दुर्गा का जन्म हुआ. देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ भयंकर युद्ध किया और अंत में उसे पराजित कर देवताओं को स्वर्ग वापस दिलाया.

देवी दुर्गा का स्वरूप:

देवी दुर्गा का स्वरूप अत्यंत भव्य और शक्तिशाली है. उनके दस हाथ हैं और वे विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं. देवी दुर्गा सिंह पर सवार हैं और उनका मुख क्रोध से भरा हुआ है.

कथा का महत्व:

महिषासुर मर्दिनी कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. यह कथा हमें सिखाती है कि हमें हमेशा सत्य और न्याय के लिए लड़ना चाहिए और बुराई का विरोध करना चाहिए.

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