भारत के राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के 150 वर्ष पूरे हो गए हैं। वर्ष 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इस अमर रचना को बंगाल में लिखा था, जिसे बाद में 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित किया गया। आज यह पंक्ति न सिर्फ भारतीय साहित्य का गौरव है, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में राष्ट्रीय चेतना का सबसे प्रभावशाली प्रतीक मानी जाती है।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान “वन्दे मातरम्” एक नारा बनकर उभरा। यही नारा स्वदेशी आंदोलन की जनभावना का मूल बना। इसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों से लेकर सभाओं-रैलियों तक — “वन्दे मातरम्” स्वतंत्रता संघर्ष का परिचय बन गया।
राष्ट्रगीत का दर्जा
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वन्दे मातरम् को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगीत का दर्जा दिया।
राष्ट्रगान — जन गण मन
राष्ट्रगीत — वन्दे मातरम्
आज के 150 वर्ष का महत्व
150 वर्ष बाद भी यह पंक्ति भारतीय समाज और राष्ट्रीय भावनाओं में उतनी ही प्रभावशाली है। स्कूल कार्यक्रमों, राष्ट्रीय पर्वों, NCC समारोह, सांस्कृतिक आयोजनों और राष्ट्रभक्ति के अवसरों पर आज भी “वन्दे मातरम्” की ध्वनि देशभक्ति और गौरव का अहसास जगाती है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि वन्दे मातरम् इतना सफल इसलिए रहा क्योंकि यह मातृभूमि को “शक्ति” और “देवी” के रूप में देखने वाली भारतीय अवधारणा को सीधा छूता है। यही कारण है कि यह सिर्फ साहित्य की पंक्ति नहीं — बल्कि राष्ट्रीय चेतना और जनभावना की धड़कन बन गया।

