बस्तर दशहरा में निभाई गई ‘भीतर रैनी’ की रस्म, आधी रात को आदिवासी ग्रामीण ले गए विजय रथ

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व में सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन जारी है। बुधवार देर रात दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म ‘भीतर रैनी’ पूरी की गई। इस दौरान आदिवासी ग्रामीणों ने आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ को नगर भ्रमण कराने के बाद प्रतीकात्मक रूप से अपने साथ ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में पहुंचाया। रथ पर बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का पवित्र छत्र विराजमान था।

करीब 600 वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा में माड़िया जनजाति के लोग प्रमुख भूमिका निभाते हैं। बस्तर दशहरा की इस रस्म को देखने और इसमें भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और आदिवासी समुदाय के सदस्य जुटे।

क्या है रथ ले जाने की परंपरा?

मान्यता के अनुसार, राजशाही के समय माड़िया समुदाय के ग्रामीण राजा से नाराज हो गए थे। अपनी नाराजगी जताने और राजा को अपने बीच बुलाने के लिए उन्होंने विजय रथ को ले जाकर जंगल में छिपा दिया था। इसके बाद राजा स्वयं ग्रामीणों के पास पहुंचे और उनके साथ भोजन कर उन्हें मनाया।

तभी से इस घटना की याद में भीतर रैनी और बाहर रैनी की परंपराएं निभाई जाती हैं। रथ को जगदलपुर से करीब चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट ले जाया जाता है।

नवाखानी के बाद वापस आएगा विजय रथ

भीतर रैनी के बाद गुरुवार को बाहर रैनी की रस्म निभाई जाएगी। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचकर ग्रामीणों के साथ नवाखानी की परंपरा में शामिल होंगे। इसमें नए धान के चावल से तैयार खीर ग्रहण की जाती है।

इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से विशाल विजय रथ को वापस जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर लाया जाएगा। इस दौरान बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोगों के शामिल होने की संभावना है।

बस्तर दशहरा की ये रस्में केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, सामाजिक समानता और राजपरिवार तथा ग्रामीणों के बीच पारंपरिक संवाद की विरासत को भी दर्शाती हैं।

You May Also Like

More From Author